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श्रमिक विरोधी कानूनों के खिलाफ SVS(श्रमिक विकास संगठन) का 15मई को एक दिवसीय सत्याग्रह

May 14, 2020 12:21 PM

दिल्ली: कोरोना संकट से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को करीब 2महीने होने जा रहे हैं, लॉकडाउन की वजह से उद्योग-धंधे ठप हैं, देश और राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो रही है। उद्योगों को पटरी पर लाने के आड में देश के छह राज्य अपने श्रम कानूनों में कई बड़े श्रमिक विरोधी बदलाव कर चुके हैं। श्रम कानूनों में बदलाव की शुरूआत राजस्थान की गहलोत सरकार ने काम के घंटों में बदलाव को लेकर किया। इसके बाद मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने बदलाव किया तो 7मई को उत्तरप्रदेश और गुजरात ने भी लगभग 3साल के लिए श्रम कानूनों में बदलावों की घोषणा कर दी। अब महाराष्ट्र, ओडिशा और गोवा सरकार ने भी अपने यहां श्रमिक विरोधी बदलाव कर दिए हैं।

श्रम कानून में बड़ा बदलाव करना केंद्र व राज्य सरकारों का मजदूर विरोधी चेहरा, श्रम कानून में बदलाव कर श्रमिकों के साथ छलावा करने जा रही है केंद्र व राज्य सरकारें: श्रमिक विकास संगठन

राज्य सरकारों द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम और कारखाना अधिनियम, 'पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट 1936' सहित प्रमुख अधिनियमों में संशोधन किए हैं। ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 को 3साल के लिए रोक दिया गया है। श्रमिकों के 38 कानूनों में बदलाव किये है, जिससे ILO कन्वेंशन 87, सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार(ILO कन्वेंशन 98), ILO कन्वेंशन 144 और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत आठ घंटे के कार्य दिवस का घोर उल्लंघन हो रहा है। राज्य सरकारें हवाला दे रही है कि कोविड-19 के चलते उद्योग सेक्टर अत्यधिक दबाव में है। जहां आज भी मुख्य हाईवे रोड मजदूर लोग देश के अलग-अलग प्रदेशों से अपने प्रदेश-गांव-शहर के लिए पैदल चलते देखे जा सकते हैं, जहां एक ओर कोरोना वायरस की मार से पूरा देश जल रहा है, वही दूसरी ओर राज्य सरकारें उद्योगों की हिस्सेदारी को लेकर चिंतिंत नजर आ रही है, लेकिन श्रमिकों की उद्योगों में योगदान का कोई जिक्र नहीं किया जा रहा है।

जैसा की ज्ञात है श्रमिक एक अनपढ़ व्यक्ति नहीं होता है, आईटीआई, वोकेशनल ट्रेनिंग, हायर सेकेंडरी करने के पश्चात अर्ध-कुशल, कुशल एवं उच्च-कुशल को श्रमिक विभाग के नियमानुसार किसी भी उद्योग या ठेकेदारी प्रथा में नौकरी दी जाती है, अब जिस प्रकार राज्य सरकारों ने श्रमिक नियमों में उद्योगों को बढ़ावा देने का हवाला देते हुए नियमों को शिथिल किया है, उससे श्रमिक वर्ग पूरी तरह उद्योगपतियों एवं ठेकेदारी प्रथा के हाथों की कठपुतली बन जाएगा। क्योंकि राज्य सरकारों ने उन तमाम प्रावधानों को समाप्त कर दिया है, जिसके माध्यम से उद्योगपतियों ठेकेदारी प्रथा के हाथों पीड़ित होने पर श्रम न्यायालय एवं न्यायालय की शरण में जा सकता था।

उत्तराखंड के सभी जिलों में भी होगा लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए एक दिन का उपवास, सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत 15मई सवेरे 10बजे से शाम 6बजे तक, पवन पाण्डे

उद्योगपतियों को नियमों के जरिए उद्योग बढ़ावा देने के लिए श्रमिकों से अब 8घंटे की जगह शिफ्ट को 12घंटे का कर दिया है उद्योगपतियों को यह छूट दी जा रही है कि वह सुविधा के अनुसार शिफ्ट(पाली, पारी) में भी बदलाव कर सकते हैं, जिस प्रकार कानून में संशोधन किया गया है उससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि राज्य सरकारों का यह निर्णय पूर्णत: श्रमिक विरोधी है, इसे लागू होने से श्रमिकों के अधिकारों का हनन होगा।

राज्य सरकारों द्वारा लेबर कानून के बदलाव से मुख्य संभावित खतरे पैदा हो गए हैं...

1. उद्योगों को सरकारी व यूनियन की जांच और निरीक्षण से मुक्ति देने से कर्मचारियों/श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा।
2. शिफ्ट व कार्य अवधि में बदलाव की मंजूरी मिलने से कर्मचारियों/श्रमिकों को बिना साप्ताहिक अवकाश के प्रतिदिन 8घंटे से ज्यादा काम करना पड़ेगा। जो कि 8घंटे काम के एक लम्बी लड़ाई के बाद प्राप्त हुए थे।
3. श्रमिक यूनियनों को मान्यता न मिलने से कर्मचारियों/श्रमिकों के अधिकारों की आवाज कमजोर होगी और पूंजीपतियों का मनमानापन बढ़ेगा। मजदूरों के काम करने की परिस्थिति और उनकी सुविधाओं पर ट्रेड यूनियन कि दखल/निगरानी खत्म हो जाएगी।
4. उद्योग-धंधों को ज्यादा देर खोलने से वहां श्रमिकों को डबल शिफ्ट करनी पड़ेगी, जिससे शोषण बढ़ेगा।
5. पहले प्रावधान था कि जिन उद्योग में 100 या ज्यादा मजदूर हैं, उसे बंद करने से पहले श्रमिकों का पक्ष सुनना होगा और अनुमति लेनी होगी। अब ऐसा नहीं होगा, इससे बड़े पैमाने पर श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा। उद्योगों में बड़े पैमाने पर छंटनी और वेतन कटौती शुरू हो सकती है।
6. अब कानून में छूट के बाद ग्रेच्युटी देने से बचने के लिए उद्योग, ठेके पर श्रमिकों की हायरिंग बढ़ा सकते हैं। जिससे बड़ी संख्या में बेरोजगारी बढ़ेगी।
7. मालिक श्रमिकों को उचित वेंटिलेशन, शौचालय, बैठने की सुविधा, पीने का स्वच्छ पानी, प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स, सुरक्षात्मक उपकरण, कैंटीन, क्रेच, साप्ताहिक अवकाश और आराम के अंतराल प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं होंगे, जो कि श्रमिकों के मूल अधिकार थे।

उत्तराखंड में SVS के प्रदेश अध्य्क्ष, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य संदीप भटनागर एवं संरक्षक श्यामलाल नाथ जी रखेंगे, अपनी जगह पर उपवास एवं सोशल मीडिया पर लाइव भी रहेंगे। श्रमिक विकास संगठन(SVS) असंवैधानिक तरीके से श्रमिक कानून में किए गए बदलाव का पूर्णत: विरोध करता है, इसके साथ ही सरकार के इस कृत्य के विरोध में श्रमिक विकास संगठन(SVS) के सभी पदाधिकारी/सदस्य भी कल 15मई को देशव्यापी एक दिवसीय सत्याग्रह “सामूहिक उपवास” के द्वारा विरोध दर्ज कराएँगे।

 
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