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अगर जल संकट को मिटाना है तो वर्षा जल संरक्षण को अपनाना होगा - महेंद्र मीना

May 13, 2020 07:24 PM

राजगढ़(अलवर): जीवन के लिए जल एक मात्र ऐसा कारण है जिसकी वजह से पृथ्वी ग्रह पर जीवन मौजूद है, इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। हालांकि, गुजरते समय के साथ-साथ ताजे पानी के स्रोत कम होते जा रहे हैं। आम आदमी पार्टी राजस्थान प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य महेंद्र मीना ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र सहित कई वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्ट से यह संकेत मिले हैं कि यदि जल की वर्तमान स्थित में कोई बदलाव नहीं किया जाता है और निवारक उपायों पर ध्यान नहीं दिया जाता है, तो 2050 तक दुनियाभर में ताजे पानी के स्रोत समाप्त होने शुरू हो जाएंगे। वर्षा जल संचयन एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है जो विभिन्न उद्देश्यों के लिए और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वर्षा जल को संरक्षित करने में मदद करती है। वर्षा जल संचयन विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले वर्षा के जल को इकट्ठा करने और संग्रहीत करने की एक विधि है जिसका उपयोग भविष्य में भी किया जा सकता है।

महेंद्र मीना ने चिंता जताते हुए कहा कि एक ताजा और दुःखद खबर यह है कि राजस्थान का एक चौथाई हिस्सा पूरी तरह रेगिस्तान में तब्दील हो गया है। राजस्थान को हरा भरा बनाने का सपना अभी भी सिर्फ खुली आंखों से देखा जा रहा है। कागजों पर भले राजस्थान तेजी से विकास कर रहा राज्य है लेकिन सच ये भी है कि राजस्थान के संसाधन तेज रफ्तार से खत्म होते जा रहे हैं। राजस्थान का वन प्रदेश, पहाड़, नदियां, झीलें और जलस्रोत घोर संकट की घड़ी से गुजर रहे हैं। मीना ने कहा कि एक विख्यात उक्ति है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। शहरी इलाकों में ये महायुद्ध अभी भी देखा जा सकता है। बड़ा प्रश्न यह है कि लगातार बढ़ रही जनसंख्या के अनुपात में जलस्रोत कितने बढ रहे हैं? क्या वे नष्ट और लुप्त तो नहीं हो रहे? तेजी से शहरीकरण हो रहा है, इमारतों के जंगल खड़े हो रहे हैं लेकिन प्राकृतिक स्रोतों का लगातार दोहन हो रहा है और स्रोत सीमित दर सीमित हो रहे हैं।

महेंद्र मीना ने बताया कि पानी के मामले में गरीब कहे जाने वाले राज्य राजस्थान में अब पारंपरिक और प्राचीन जल संरक्षण प्रणालियों के पुनरूद्धार की शख़्त जरूरत है। राजस्थान भारत के सबसे सूखे राज्यों में से एक है और यहां सालाना 100मिमि से भी कम वर्षा होती है। थार रेगिस्तान की इस भूमि पर गर्मियों का तापमान 48° के पार पहुंच जाता है। हजारों साल से यह रेगिस्तान यहीं था। फिर ऐसी कौन सी तकनीकें थी जिनसे यहां रहने वाले लोगों को पीने, खेत सींचने और भवन, महल, दुर्ग बनाने के लिए पर्याप्त जल मिल जाया करता था? जवाब है, सैकड़ों छोटी, मध्यम और सरल तकनीकें। जिनसे यहां  के निवासी सीमित जल का बेहतर उपयोग और कुशल संरक्षण करना जानते थे। अपनी परंपराओं से कट कर हमने यह ज्ञान भी लगभग खो दिया है। इन प्राचीन जल संरक्षण  तकनीकों की हमें एक बार फिर सख्त आवश्यकता है। क्योंकि हमारे पास विकल्प न के बराबर हैं। अगर हम सही प्रकार से इन प्राचीन विधियों का प्रयोग कर सके तो आने वाली पीढियों को और सूखे से जूझ रहे प्रदेशवासियों के हित में कुछ अच्छा कर पाएंगे। राजस्थान में मानसून के अलावा मावठ भी  होती है। कुछ बारिशों में ये छोटे जोहड़े कुछ महिनों तक मवेशियों, भवन निर्माण, सिंचाई और अन्य घरेलू कार्यों में पानी की जरूरत को पूरा कर देता है। खास बात ये है कि इन जोहड़ों से भूजल स्तर भी उठता है। एक गैर सरकारी संगठन ’तरुण भारत संघ’ ने राजस्थान के अलवर जिले में इस परियोजना पर बड़े पैमाने पर काम किया और गांव गांव को पानी उपलब्ध करा दिया। वर्तमान में हम इसलिए जल संकट से जूझ रहे हैं क्योंकि हमने हमारी समृद्ध पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों से कट गए हैं। इन प्राचीन तकनीकों को प्रयोग कर हम आबादी के 70प्रतिशत भाग को जल संकट से बचा सकते हैं। तकनीक के अभाव में हम पेयजल का उपयोग ही हर कार्य के लिए कर रहे हैं। चाहे वह भवन निर्माण हो या फिर पशुओं या वाहनों को साफ करने के लिए। सीआईआई जैसे संगठन इस दिशा में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध हो गए हैं और विजन 2022 लेकर चल रहे हैं। विशिष्ट बात यह भी है कि ’जोहड़’ जैसे प्राचीन स्रोतों के पुनरुद्धार से 33 प्रतिशत वन क्षेत्र में इजाफा भी हुआ है। अलवर इसका उदाहरण है।

राजस्थान इस समय जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में रेतीले इलाकों में बाढ आना, मानसून का सूखा गुजरना, सर्दी के मौसम में वर्षा जैसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं। ऐसे में मौसम की अनिश्चितता भी संकेत करती है कि हमें जल संरक्षण की हमारी पारंपरिक तकनीकों को अपनाकर नई राह का सृजन करना होगा। राजस्थान में कई इलाके तो ऐसे हैं जहां पीने के लिए भी पानी नहीं है थोड़ा पानी लेने के लिए भी उन्हें लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है हैण्डपम्प, नलकूप पर घंटों लाइन लगानी पड़ती है, ग्राउंड वॉटर लेवल तेजी से नीचे जा रहा है। राजस्थान के 295ब्लॉकों में से 185ब्लॉक डार्क जोन में चले गए हैं, 2013 में जिन डार्क जोनों की संख्या 164 थी, वहीं अब बढ़कर 185 पहुंच गई है। डार्क जोन का मतलब ये होता है जिन इलाकों में जमीन के नीचे से पानी तो अधिक ले रहे है, लेकिन जमीन में पानी कम रिचार्ज हो रहा है। राजस्थान के 8 जिले 100 फीसदी डार्क जोन में चले गए है।

राजस्थान के डार्क जोन वाले जिले इस प्रकार है...

जिला इतने ब्लॉक डार्क जोन में
अजमेर सभी 9 ब्लॉक
अलवर सभी 14 ब्लॉक
भीलवाड़ा सभी 12 ब्लॉक
चितौडगढ़ सभी 11 ब्लॉक
दौसा सभी 6 ब्लॉक
जैसलमेर सभी 3 ब्लॉक
जालौर 8 में से 7 ब्लॉक
झुंझुनू सभी 8 ब्लॉक
नागौर 14 में से 12 ब्लॉक

अलवर जिला डार्क जोन की चपेट में, राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र में भूजल स्तर गिरा...

महेंद्र मीना ने कहा कि जमीन को जरूरत का आधा ही पानी मिल पाने का नतीजा है कि दिनों दिन पेयजल संकट गहराता जा रहा है। पानी की मारामारी से छुटकारा दिलाने के लिए न गंभीरता से सरकारी प्रयास हो रहे हैं और न ही लोग इस मर्ज को समझ पा रहे हैं। आज पेयजल आपूर्ति की दृष्टि से देखें तो जनता आईसीयू में है, अगर जल्द इसका उपाय नही किया तो जनता वेंटिलेटर पर चली जाएगी, फिर जीवन बचना मुश्किल ही नही लगभग असंभव हो जाएगा। साल दर साल कम होती बारिश और घटते वर्षा जल रिचार्ज ने भूजल को रसातल तक पहुंचा दिया है। हालात यह हो गए कि जिले के सभी 14ब्लॉक डार्क जोन में शामिल होने के साथ ही राजगढ़-रैनी-लक्ष्मणगढ़ का जलस्तर नीचे चला गया है कमोबेश ऐसी ही स्थिति जिले के अन्य ब्लॉकों की हो गई है।

वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है...

भूजल में गिरावट एवं प्रति वर्ष पानी के बढ़ते दोहन की समस्या से निबटने के लिए सरकार ने वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की अनिवार्यता लागू की लेकिन सरकार के ये प्रयास अब तक कागजी साबित हुए हैं। वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की शुरुआत सबसे पहले जिला मुख्यालय स्थित सरकारी कार्यालयों एवं बड़े भूखण्डों में निर्माण से पहले करनी थी, लेकिन अब तक तीन-चार कार्यालयों को छोड़ शेष में वाटर सिस्टम का ढांचा ही तैयार नहीं हो सका। जिन कार्यालयों में यह सिस्टम शुरू किया, वहां भी यह सारसंभाल के अभाव में निरर्थक साबित हुए। बड़े भूखण्डों में वाटर सिस्टम निर्माण की अनिवार्यता औपचारिकता बनकर रह गई। पानी रिचार्ज के सरकारी प्रयास ना काफी साबित हो रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में  कच्ची जगह नहीं बचने से वाटर रिचार्ज संभव नहीं हो रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में रिचार्ज के प्रयास आधे-अधूरे रहे हैं।जलदाय विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में हैंडपंप व सिंगल फेज ट्यूबवैल के पास सोखता गड्ढ़ानुमा रिचार्ज सिस्टम बनाता है, लेकिन सारसंभाल के अभाव में ज्यादातर व्यर्थ साबित हो रहे हैं। मनरेगा के तहत एनीकट निर्माण भी पानी रिचार्ज में ज्यादा सहायक नहीं हो सके हैं।

अलवर जिले में पानी रिचार्ज का गणित इस प्रकार है...
प्रतिवर्ष जल दोहन 1.34 बिलियन घनमीटर
पानी का रिचार्ज 0.83 बिलियन घनमीटर
रिचार्ज में गिरावट 55 प्रतिशत के करीब
भूजल में गिरावट 1.15 मीटर
डार्क जोन जिले के सभी 14 ब्लॉक
औसत बारिश 555 मिलीमीटर
जिले में बांध 130रीते
बांध करीब 125
बांध जिनमें पानी आया 07
प्रमुख नदी-नाले  06
सूखे  04

जलदाय विभाग अलवर ने बताया कि जलदाय विभाग की ओर से लगाए जाने वाले हैंडपंपों व सिंगल फेज ट्यूबवैल के पास सोखता गड्ढानुमा वाटर रिचार्ज सिस्टम बनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गत पांच साल में लगे हैंडपंपों व सिंगल फेज ट्यूबवैलों के पास रिचार्ज सिस्टम बनाए गए हैं। अलवर जिले के कई गांव में राजा महाराजाओं के समय के तालाब सूख चुके हैं तालाबों की बनावट अपने आप में उनकी विशालता बयां करती है ग्रामीणों के अनुसार गांव के तालाबों से आसपास के कई गांव के लोगों का जीवन यापन होता था लेकिन तालाब सूखने से अब ग्रामीणों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है ऐसे में सभी को एक प्रयास करने की आवश्यकता है समय रहते अगर हम नहीं जागे तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे। भू जलस्तर को रिचार्ज करने में सबसे बेहतर तालाब माने जाते थे इसलिए सभी गांव में जरूरत के हिसाब से छोटा बड़ा तालाब होता था, आसपास के पहाड़ों का पानी इन तालाबों में आता था और उस पानी से कृषि कार्य सहित सभी काम काज होते थे लेकिन तालाब सूखने से जिले में पानी संकट मंडराने लगा है। डार्क जोन में आता है अलवर...अगर अब भी नहीं जागे तो खड़ा हो जाएगा बड़ा संकट, जनसंख्या घनत्व के हिसाब से जयपुर के बाद राजस्थान में अलवर दूसरा बड़ा जिला है। यहां 11विधानसभा और 4लोकसभा क्षेत्र लगते हैं, अलवर में छोटे-बड़े 12उद्योगी क्षेत्र हैं, जिनमें हजारों औद्योगिक इकाइयां हैं, देशभर के लोग रोजगार के लिए अलवर आते हैं, ऐसे में सभी की जरूरत के हिसाब से पानी अति आवश्यक है, लेकिन जिले में सतही जल के इंतजाम नहीं होने के कारण हालात दिनों दिन खराब हो रहे हैं। अलवर के बहरोड, नीमराना, भिवाड़ी, तिजारा, थानागाजी, बानसूर, मंडावर रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, राजगढ़, रैनी सहित कई क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर काफी नीचे पहुंच गया है। जलदाय विभाग को भी 700 से 800 फिट गहरी बोरिंग खोजनी पड़ती हैं कई बार अलवर में चंबल और यमुना का पानी लाने की योजना तैयार हुई लेकिन सालों से यह योजनाएं केवल फाइलों तक ही सिमट कर रह गई।

 
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