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ग्राम उदय से भारत उदय का 'ढोल' पीट कर अपना प्रचार कर गए 'मोदी'

May 04, 2019 02:39 PM

वादा—फ़रामोशी यानि प्रधानमंत्री मोदी की कथनी और करनी के अंतर को सप्रमाण बयां करता एक ऐसा पुख्ता दस्तावेज़ है जिसके एक—एक शब्द को प्रमाणित करने के लिए कड़ी मेहनत की गई, सैकड़ों आरटीआई के माध्यम से भारत सरकार के तमाम मंत्रालय खंगाले गए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में किए जाने वाले दावों को गौर से सुना गया और धरातल पर कुछ भी नज़र न आने पर संबंधित मंत्रालयों से सूचना अधिकार के जरिए सीधे प्रश्न पूछे गए। आरटीआई के इन दस्तावेजों को पुस्तक आकार दिया है संजॉय बासु, नीरज कुमार एवं शशि शेखर ने.

'आप की क्रांति' संपादकीय मंडल ने इस पुस्तक को मनोयोग से पढ़ने के उपरांत इसकी उपयोगिता और सारगर्भिता के  मद्देनजर इसे क्रमश: प्रकाशित करने का निर्णय लिया है, आशा है हमारे सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा।

 कभी शाइनिंग इंडिया के नाम पर एक सरकार ने सिर्फ एडवर्टिजमेंट पर करोडों रुपये खर्च कर दिए थे, अब इंडिया शाइनिंग हुआ या नहीं, कहना मुश्किल है. लेकिन, श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कुछ उसी तर्ज पर ग्राम उदय से भारत उदय नाम का अभियान शुरु किया, जिसका वास्तव में न तो ग्राम उदय से न भारत उदय से कोई लेनादेना था. यह अभियान असल में सरकार के प्रचार का एक अनोखा तंत्र बन गया. कैसे ? आइए इस पर चर्चा करते है. 

वादा—फ़रामोशी यानि प्रधानमंत्री मोदी की कथनी और करनी के अंतर को सप्रमाण बयां करता एक ऐसा पुख्ता दस्तावेज़ है जिसके एक—एक शब्द को प्रमाणित करने के लिए कड़ी मेहनत की गई, सैकड़ों आरटीआई के माध्यम से भारत सरकार के तमाम मंत्रालय खंगाले गए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में किए जाने वाले दावों को गौर से सुना गया और धरातल पर कुछ भी नज़र न आने पर संबंधित मंत्रालयों से सूचना अधिकार के जरिए सीधे प्रश्न पूछे गए। आरटीआई के इन दस्तावेजों को पुस्तक आकार दिया है संजॉय बासु, नीरज कुमार एवं शशि शेखर ने. 

'आप की क्रांति' संपादकीय मंडल ने इस पुस्तक को मनोयोग से पढ़ने के उपरांत इसकी उपयोगिता और सारगर्भिता के  मद्देनजर इसे क्रमश: प्रकाशित करने का निर्णय लिया है, आशा है हमारे सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा।

 

14 अप्रैल 2016 को डॉ भीमराव अंबेडकर की 125 वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस कार्यक्रम की शुरुआत मध्य प्रदेश के मऊ  से  की. इस अभियान का मूल उद्देश्य था, डॉ अंबेडकर की  दृष्टि  से प्रेरित होकर गांवों में सामाजिक सद्भावना को बढाना, फसल बीमा योजना, स्वॉयल हेल्थ कार्ड आदि के बारे में जानकारी देकर कृषि  को बढ़ावा देना, ग्राम सभा की बैठकों का प्रबंधन करना  ताकि क्षेत्रीय विकास योजनाओं के लिए पैसे का सही उपयोग हो सके, आदि. 

अब, गांवों में सामाजिक सद्भाव की हालत क्या है, इससे हम सब वाकिफ हैं. जातीय और वर्गीय संघर्ष का स्वरूप देश के गांवों में कैसा है, इसे भी हम देख ही रहे हैं. हम यह भी देख रहे है कि फसल बीमा योजना से किसानों का कितना फायदा हुआ. हमने इस पूरे अभियान की सच्चाई जानने के लिए आरटीआई का सहारा लिया. सूचना पाने के लिए हमे केंद्रीय सूचना आयोग का दरवाजा तक खटखटाना पड़ा, क्योंकि इस सूचना को देने से कईं मंत्रालयों ने इनकार कर दिया था. 

 सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय के एक पत्र, 25 अक्टूबर 2018, से हमें यह पता चला कि यह अभियान पंचायती राज मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय, कृषि एवं  किसान कल्याण मंत्रालय, सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय और सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मिलकर चलाया था.

इस मंत्रालय ने 8.53 करोड़ रुपये पोस्टर ,पैम्फलेट आदि छापने में लगा दिए. 12 नवंबर 2018 को दिए गए एक जवाब के अनुसार ग्रामीण विकास मंत्रालय ने विज्ञापनों और संबन्धित प्रक्रियाओं पर 5.46 करोड़ रुपये का खर्चा किया. 9 नवंबर 2018 को प्राप्त जवाब के मुताबिक, पंचायती राज मंत्रालय ने 30.47 लाख रेडियो और टीवी के विज्ञापनों पर खर्च किए. 24 सितंबर 2018 के जवाब के अनुसार, पंचायती राज मंत्रालय ने समाचार पत्रों के विज्ञापनों के लिए 4.38 करोड़ और विभिन्न सामग्रियों की छपाई के लिए 4.58 लाख का खर्च किया है. 

 इसके अलावा, मंत्रालय ने 24 अप्रैल 2016 को जमशेदपुर में इस अभियान के समापन समारोह का आयोजन करने के लिए झारखंड सरकार को 96.6 लाख रुपये दिए हैं. चूंकि, पंचायती राज मंत्रालय ने अन्य मंत्रालयों द्वारा किए गए खर्चों का विवरण देने के लिए केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष जिम्मेदारी ली थी, लेकिन आज तक न तो कृषि मंत्रालय और न ही पेयजल मंत्रालय ने सूचना दी है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर किए गए खर्चों का आंकड़ा प्राप्त करने के लिए, हमने डीएवीपी में एक आरटीआई दायर की. वहां से मिले जवाब के अनुसार, इस अभियान के प्रचार के लिए लगभग 9.64 करोड़ रुपये रेडियो और टेलीविजन एडवर्टिजमेंट पर खर्च किए गए.

 कुल मिला कर, हम यह मान सकते हैं कि लगभग 35 से 40 करोड़ रुपये एडवर्टिजमेंट पर खर्च किए गए. तो सवाल है कि इस खर्च का परिणाम या उपलब्धियां क्या हैं? क्या आपको नहीं लगता है कि यह करदाताओं के पैसे का व्यर्थ खर्च था? क्या इस अभियान पर करोडों रुपये खर्च करने के बाद भी ग्राम उदय हो सका? 

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